राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त पर परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी

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हैदराबाद: सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद और विश्व भाषा अकादमी, भारत की तेलंगाना इकाई के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। संस्था की संस्थापिका सरिता सुराणा ने बताया कि यह मासिक गोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई।

गोष्ठी की अध्यक्षता शहर के वरिष्ठ कवि एवं जाने-माने लेखक गजानन पाण्डेय ने की। गोष्ठी का शुभारम्भ आर्या झा की सरस्वती वंदना से हुआ। तत्पश्चात् संयोजिका ने सभी अतिथियों एवं सदस्यों का स्वागत किया। प्रथम सत्र में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के जीवन एवं काव्य-संसार पर विस्तृत चर्चा की गई।

जीवन परिचय

गुप्त जी का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए सरिता सुराणा ने कहा कि उनका जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर-प्रदेश के झांसी जिले के पास स्थित चिरगांव में हुआ था। उनके पिता का नाम सेठ रामचरण और माता का नाम काशीबाई था। वे अपने माता-पिता की तीसरी सन्तान थे।

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उनके माता-पिता वैष्णव थे। विद्यालय में खेल-कूद में अधिक ध्यान देने के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई। तब घर में ही उन्हें हिन्दी, बांग्ला और संस्कृत भाषाओं के साहित्य का अध्ययन करवाया गया। पण्डित रामस्वरूप शास्त्री और दुर्गादत्त पंत आदि उनके शिक्षक थे और मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। उनके पिता ‘कनकलता’ उपनाम से भक्तिपूर्ण कविताएं लिखते थे, उसका प्रभाव बालक मैथिलीशरण गुप्त पर पड़ा और 12 वर्ष की अवस्था में ही वे ब्रजभाषा में कविता लिखने लगे।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से संपर्क

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने के बाद उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी में रचनाएं लिखना शुरू कर दिया और उनकी रचनाएं प्रसिद्ध पत्रिका ‘सरस्वती’ में प्रकाशित होने लगी। सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा लेकिन आरोप सिद्ध नहीं होने पर 7 महीने बाद उन्हें छोड़ दिया गया। सन 1948 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट की उपाधि से सम्मानित किया गया। ईस्वी सन् 1952-1964 तक वे राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। सन् 1954 में उनकी साहित्यिक एवं शैक्षिक सेवाओं के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया। उनकी कृति ‘भारत भारती’ देश के स्वतंत्रता संग्राम के समय में बहुत प्रभावशाली सिद्ध हुई थी, इसलिए महात्मा गांधी ने उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि प्रदान की थी।

उनकी जयन्ती प्रतिवर्ष 3 अगस्त को ‘कवि दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए सुनीता लुल्ला ने गुप्त जी के साहित्य में नारी पात्रों यथा- उर्मिला, यशोधरा और विष्णुप्रिया के जीवन चरित्रों पर विशद प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब इन स्त्रियों को परित्यक्ता कहकर संबोधित किया जाता था, तब भी इन्होंने अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन किया और अपने उदात्त चरित्र का निर्माण और विकास किया। गुप्तजी ने इतिहास की इन उपेक्षित नारियों को अपनी काव्य रचना का विषय बनाकर उन्हें जो सम्मान प्रदान किया, उससे वे अभिभूत हैं। ‘यशोधरा’ उनकी प्रिय कृति है, जिसे वे बार-बार पढ़ती हैं और जब भी पढ़ती हैं उनकी आंखों के कोर भीग जाते हैं।

वक्ताओं के विचार

कटक, उड़ीसा से अतिथि वक्ता के रूप में आमंत्रित रिमझिम झा ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मैथिलीशरण गुप्त की ‘नर हो न निराश करो मन को’ और ‘चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में’ आदि कविताएं उनको बहुत प्रिय हैं। उन्होंने अपनी स्वरचित पंक्तियां सुनाकर सबसे वाहवाही बटोरी-
‘जिनकी रचनाओं के हम बचपन से हैं कायल, जिनके साहित्य रूपी तरकस के बाणों से हम हैं घायल’। दर्शन सिंह ने गुप्त जी को राष्ट्र चेतना का कवि बताया और उनकी कविता ‘भरा नहीं जो भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं बस पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं’ का उल्लेख किया।

द्वितीय सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें भावना पुरोहित ने संयुक्त परिवार पर और बिनोद गिरि ने जाने वाले साल पर अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। आर्या झा ने अपनी लघुकथा ‘साक्षात्कार’ का वाचन बहुत ही रोचक अन्दाज में किया। मेरठ, उत्तर प्रदेश से विशेष अतिथि के रूप में शामिल सदन कुमार जैन ने ‘चिड़िया की सबसे बड़ी उपलब्धि है’ और ‘तुमने इस धरती पर जन्म लिया’ कविताओं का पाठ किया। कोलकाता से एक और विशेष अतिथि नीता अनामिका ने गुप्त जी की एक कविता का पाठ किया। साथ ही अपनी रचना ‘मनुष्य अनंत काल से ही स्वयं की इच्छाओं का गुलाम रहा है’ का वाचन किया। हर्षलता दुधोड़िया ने ‘हे हंसवाहिनी मां, हम शरण में आए हैं’ का गान किया।

कन्या भ्रूण हत्या की भी हुई बात

रिमझिम झा ने ‘कन्या भ्रूण हत्या नहीं रुकी तो तैंतीस प्रतिशत का हक धरा पर धरा रह जाएगा’ की मार्मिक प्रस्तुति दी। संतोष रजा ने ‘अच्छे दिन से दिन बुरा भी कम नहीं है’ गज़ल प्रस्तुत की। सुनीता लुल्ला ने ‘अनगिन साल नहीं हैं काफ़ी, और बहुत कुछ बाकी है’ गीत का पाठ करके समां बांध दिया। दर्शन सिंह ने ‘समंदर को ढूंढती है नदी न जाने क्यों’ प्रस्तुत की। संगीता शर्मा ने ‘प्रेम की अभिव्यक्ति न हो तो’ और सरिता सुराणा ने ‘क्या है भ्रूण हत्या, ईश्वरीय सत्ता को खुली चुनौती’ रचनाएं प्रस्तुत की।

अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए गजानन पाण्डेय ने सर्वप्रथम गुप्त जी पर हुई सार्थक परिचर्चा के लिए संस्थापिका को और वक्ताओं को बधाई दी तत्पश्चात् श्रीमद्भागवत गीता जयन्ती के उपलक्ष्य में अपनी एक रचना ‘तुम क्या लाए जो रोते हो’ का पाठ किया। संस्थापिका ने सभी अतिथियों और सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक माह हमारे साथ देश भर से नए साहित्यकार जुड़ रहे हैं और संस्था को मजबूत बना रहे हैं। सभी सदस्यों ने वर्ष 2020 को अलविदा कहते हुए नववर्ष में एक नए उत्साह और उमंग के साथ फिर मिलने की बात कहते हुए एक-दूसरे से विदाई ली।

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